नई शिक्षा नीति के को-ऑर्डिनेटर श्रीधर 80% दिव्यांग; मदद न लेनी पड़े इसलिए स्कूल में टॉयलेट रोके रखते थे, कम खाते थे ताकि वजन न बढ़े
नई दिल्ली .दुनिया में कई लोग छोटी सी विफलता से हार मान लेते हैं, वहीं कुछ लोग इसे चुनौती के रूप में लेकर मिसाल कायम करते हैं। ऐसी ही शख्सियत हैं एमके श्रीधर, बचपन से ही 80% दिव्यांग हैं। 65 साल के श्रीधर ने देश की नई शिक्षा नीति की ड्राफ्ट करने में अहम भूमिका निभाई है। आंध्र प्रदेश के हिन्दुपुर में जन्मे श्रीधर ने शारीरिक अक्षमताओं, बाधाओं के बावजूद संघर्ष कर पढ़ाई की, बेंगलुरू से पीजी और मैसूर यूनिवर्सिटी से पी.एचडी की। 1999 में यहीं प्रोफेसर बन गए। श्रीधर बताते हैं कि 4 साल की उम्र में ही इस कमी का पता चल गया था। बेंगलुरू मंे फिजियोथेरेपी, इलेक्ट्रिक शॉक, जैसी चीजों से उपचार किया गया।
इससे पढ़ाई पर भी असर होता था। इस बीच चेन्नई की एक संस्था के बारे में पता चला, 1963 में वहां पहुंचा। 14 साल की उम्र तक नौ सर्जरी हो चुकी थी। इसके बाद हिन्दुपुर लौट आया। उस समय तक व्हीलचेयर नहीं थी। तब तक मैं जमीन पर हाथों के बल चलता था। स्कूल में टॉयलेट लगती थी तो रोक लेता था। घर आकर टाॅयलेट जाता था। पानी भी कम पीता था। मां अक्सर कहती थीं कि खाने पर नियंत्रण रखना, ज्यादा खाओगे तो वजन बढ़ेगा। इससे तुम दूसरों के लिए बोझ बन जाओगे।
उन्होंने बताया कि बचपन में जो कष्ट सहे वैसे दूसरों को न उठाना पड़े, इसलिए 10 साल पहले संस्था खोली। इसमें दिव्यांग बच्चों के इलाज, पढ़ाई, सुरक्षा की व्यवस्था है। यहां छात्र 6ठी से ग्रेजुएशन तक पढ़ाई करते हैं। देशभर के ऐसे 100 दिव्यांग बच्चे यहां से लाभ चुके हैं। एेसे लोगों को नौकरी मिल सके, इसलिए नए साल में वोकेशनल कोर्स शुरू करेंगे।
40 लोगों से रोज बात, 50 बैठकें, 4 लाख सुझाव आए, तब बना ड्राफ्ट
मेरे पास नई नीति के लिए को-ऑर्डिनेशन की जिम्मेदारी थी। रोज करीब 40 लोगों से बात होती थी। दो माह में एक बार सभी सदस्य मिलते थे। 50 से ज्यादा बैठकें हुई। करीब चार लाख सुझाव आए। मुझे इस काम में बहुत मजा गया। कई घंटों काम किया। इस पूरे काम में नरसिम्हा साए की तरह मेरे साथ रहा।
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