अबोहर. आज दुनिया नए साल के जश्न में डूबी है। दैनिक भास्कर प्लस ऐप्प 24 साल पहले घटी एक ऐसी घटना के बारे में बता रहा है, जब देश-दुनिया में आज ही की तरह नए साल का जश्न था। इसी जश्न के बीच हरियाणा-पंजाब के सैकड़ों घरों से रोने-बिलखने की आवाजें भी आ रही थी। इन्हीं में से एक घर संजय ग्रोवर का भी था, जो 23 दिसंबर 1995 को डबवाली के भीषण अग्निकांड में अपनी जान की परवाह न करते हुए कूद पड़े और 25 मासूमों को मौत के मुंह से निकाल लाए थे। फिर 9 जिंदगी-मौत के बीच झूलते हुए 1 जनवरी 1996 को यह सुपर हीरो दुनिया को अलविदा कह गया।
यह थी दिल दहला देने वाली वो घटना
23 दिसंबर 1995 को डबवाली के राजीव पैलेस में डीएवी स्कूल का एनुअल फंक्शन चल रहा था। तभी अचानक आग लगी और खुशी का माहौल मातम में बदल गया। चीख-पुकार के बीच 5 मिनट के भीतर 442 लोग झुलसकर मर गए। इनमें 136 महिलाएं, 258 बच्चे शामिल थे। यह अब तक का देश का सबसे बड़ा अग्निकांड माना जाता है, जिसमें इतनी बड़ी संख्या में लोग मारे गए। कार्यक्रम से बाहर आ चुके संजय ने आग लगने के बाद चारों ओर से घिरे बच्चों की चीखें सुनी तो वह खुद को रोक नहीं पाया। पैलेस के नजदीक ही रहने वाले तेजपाल सिंह के घर जाकर एक महिला को अपने स्कूटर की चाबी, पर्स और ड्राइविंग लाइसेंस सौंपकर अपने शरीर पर कंबल लपेटा और आग की लपटों में कूद गया। एक-एक करके संजय ने 25 मासूम जिंदगियां बचाईं।
सुपरहीरो का जीवन: समाजसेवी भी और हास्य कलाकार भी
संजय ग्रोवर का जन्म 6 दिसंबर 1965 को डबवाली निवासी प्यारे लाल ग्रोवर के घर हुआ था। साल 1981 में हरियाणा के बहादुरगढ़ में हरियाणा राज्य विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लेकर दूसरा स्थान प्राप्त किया। 1985 में श्रीगुरु नानक कॉलेज किलियांवाली की ओर से डल्हौजी में यूथ लीडरशिप ट्रेनिंग कैंप में बेस्ट कैंपर का सम्मान पाया। साल 1984-85 में गुरुनानक कॉलेज का बेस्ट एक्टर घोषित किया गया। उन्होंने जंगी राम की हवेली, स्योंक, शरीफजादे, बुड्ढा विआहिया गया आदि नाटकों में प्रशंसनीय भूमिका अदा की। पंजाब के अबोहर, जीरा, मुक्तसर में हुए यूथ फेस्टिवल, कार्यक्रमों में मंच संचालन किया। अबोहर शहर की कई संस्थाओं के पदाधिकारी एवं रोट्रेक्ट क्लब के सचिव और अध्यक्ष भी रहे। 1992 में रोटेशिया-92 कांफ्रेंस के अंतर्गत कोलकाता और नेपाल का एक माह का टूर करने और जिला सिरसा से जाने वाले सदस्यों में से बेस्ट मेंबर का पुरस्कार पाया। महज 30 साल की उम्र में संजय ने रक्तदान के क्षेत्र में ऊंचा नाम कमाया। संजय ने शिक्षा के साथ-साथ 19 बार रक्तदान किया। सिरसा में घग्घर नदी में आई बाढ़ के प्रभावितों के लिए प्रतिदिन लंगर बनवाकर वहां पहुंचाते थे।
हिमाचल प्रदेश के जिला कागड़ा की एक पहाड़ी पर स्थित माता जयंती मंदिर के लिए सीढ़ियों के निर्माण कार्य और सिरसा मे घग्घर नदी में आई बाढ़ के समय यहा से लंगर बनवाकर प्रतिदिन फंसे लोगों तक पहुंचाना, सहारा वेलफेयर क्लब द्वारा आयोजित सामूहिक शादियां, श्री वैष्णो माता मंदिर के निर्माण और अन्य सामाजिक कार्याें के लिए समय-समय पर यथासंभव दान राशि देने के साथ-साथ शहर से धनराशि एकत्रित करने जैसे कार्याें में अपनी अहम भूमिका निभाई।
पहचान नहीं पाए थे भाई भी
आग की सूचना पाकर उनके पिता प्यारे लाल ग्रोवर अपने बड़े बेटे सतभूषण ग्रोवर और मंझले बेटे प्रवीण के साथ घटनास्थल पर पहुंचे, लेकिन संजय उन्हें वहां नहीं मिला। फिर प्रवीण भाई को ढूंढता हुआ सरकारी अस्पताल में पहुंचा। घायलों को देखते हुए आगे बढ़ रहा था। अग्निकांड में बुरी तरह जले अपने भाई संजय को वह पहचान नहीं पाया, लेकिन संजय ने उसे पहचान लिया। प्रवीण को देखकर वह बोला कि मैं तेरा भाई, संजय हूं....। इसके बाद संजय को पहले बठिंडा में ले जाया गया, फिर लुधियाना के डीएमसी में रेफर कर दिया गया। वहां उपचाराधीन संजय ने 1 जनवरी 1996 को अलस्सुबह ढाई बजे संजय ने दम तोड़ दिया।
मरणोपरांत मिला सम्मान
संजय की मृत्यु के बाद उसकी बहादुरी को सलाम करते हुए 1995 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार ने राष्ट्रीय युवा पुरस्कार, 1997 में रेड एंड व्हाइट कंपनी ने बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने संजय ग्रोवर को शौर्य पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए भारत सरकार को अपनी सिफारिश की थी, मगर यह सिफारिश 24 बरस बाद भी सिरे नहीं चढ़ी है।
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