चंडीगढ़. 100 साल तो पूरे करने हैं, इसके बाद सोचेंगे कि आगे क्या करना है। ये कहना है जोश से 16 साल के और उम्र से 96 साल के हॉकी स्टार बलबीर सिंह सीनियर का। बलबीर सीनियर भले ही कई बार बीमार होकर अस्पताल जा चुके हैं, लेकिन वे लगातार रिकवर कर रहे हैं।
डॉक्टर इसे इलाज से ज्यादा उनकी विल पावर का कमाल मानते हैं। जिस उम्र में शरीर साथ देना बंद कर देता है, उस उम्र में हॉकी स्टार लोगों को मोटिवेट कर रहे हैं। हालही में वे 20 दिन फोर्टिस अस्पताल रहकर लौटे हैं। उनकी हालत में सुधार हो रहा है।
पूरा करियर अस्थमा के साथ हॉकी खेलकर देश को तीन ओलंपिक गोल्ड दिलाने वाले बलबीर सिंह सीनियर अभी भी हार मानने को तैयार नहीं है। 31 दिसंबर को उन्होंने जन्मदिन मनाया।
सिर्फ सोच आपको स्ट्रॉन्ग बनाती है: बलबीर सीनियर ने कहा कि मैंने अपने प्लेयर्स और बच्चों को जो सिखाया, वह पहले खुद पर लागू किया। अगर वे सही थे तभी उसे दूसरों के साथ शेयर किया। जैसे कि ड्रीम बिग, थिंक पॉजिटीव, वर्क हार्ड, रूम एट द टॉप इस ऑलवेज वैकेंट। बात सोच की है, अगर सोच स्ट्रॉन्ग है तो आप भी मजबूत रहेंगे।
रोटी मिस नहीं की तो गोल कैसे किया: सीनियर सिर्फ प्रैक्टिस को अहम मानते हैं। वे कहते हैं कि अंधेरे में रोटी खाते हुए जब निवाला हमेशा मुंह में जाता है तो गोल पोस्ट में गोल क्यों मिस हो जाता है। इसका सिर्फ यही कारण है कि हमने प्रैक्टिस नहीं की। करियर में जिस भी काम की आप सबसे ज्यादा प्रैक्टिस करते हैं उसमें आप कभी भी फेल नहीं होते।
डिक्शनरी में कभी 'हार' शब्द नहीं रहा: बलबीर सीनियर की डिक्शनरी में कभी हार शब्द नहीं रहा। उन्होंने कहा कि मैंने हर प्लेयर को कहा कि हार शब्द इस्तेमाल नहीं करें। कोई सोच कर नहीं जाता कि वह हारने जा रहा है। हमारा मकसद भी जीत होना चाहिए। जब गोल्ड जीतने का सोचेंगे, तभी उसे पाने के लिए मेहनत कर पाएंगे। सीनियर ने कहा कि मेरे लिए मेरे देश का झंडा आज भी सबसे बढ़कर है। मेरा परिवार भी इसके आगे कुछ नहीं है। जब मैंने पहली बार तिरंगा लहराते देखा था तो मुझे खुद के उड़ने का अहसास हुआ था, ये अहसास आज भी मेरे अंदर जिंदा है। जब मैं बीमारी से लड़ रहा था तब भी ये झंडा ही मुझे मजबूत बनाता था।
कब क्या उपलब्धि मिली
- 03 ओलंपिक गोल्ड मेडल जीते सीनियर ने, 1948 के बाद 1952 और 1956 में भी उन्होंने ओलंपिक गोल्ड जीते
- 06 गोल किए थे बलबीर सीनियर ने 1948 ओलंपिक फाइनल में, ये उनका रिकॉर्ड अभी तक कोई तोड़ नहीं पाया है
- 100 साल लंदन ओलंपिक के पूरे होने पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए, उसमें सीनियर देश के एकमात्र प्लेयर थे
- 1975 में उन्हें पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, ये किसी भी खिलाड़ी का दिया गया पहला पद्मश्री अवॉर्ड था
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