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कौन कहता है बच्चे कमाल नहीं कर सकते?


एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु [raghu@dbcorp.in]

 मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए 9190000071 पर मिस्ड कॉल करें

ह म सभी ने सुना है कि भलाई करने वाले लोग स्कूलों में लाइब्रेरी बनाने में मदद करते हैं। लेकिन हममें से कितने लोगों ने सुना है कि लाइब्रेरीज स्कूल में बदल गईं या स्कूल बनाने का रास्ता बनीं? और वह भी बच्चों द्वारा बनाई गईं लाइब्रेरीज।

यह रहा इसका सबूत। कर्नाटक के बांदीपुर वन्यजीव अभ्यारण्य के पास मंगला गांव है। पर्यटकों की ज्यादा संख्या के चलते यहां के गरीब लोग पर्यटकों को सेवाएं देकर आजीविका कमाते हैं और इस काम में अपने बच्चों को भी इस्तेमाल करते हैं। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मंगला सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या कम हो गई और अंतत: एक दिन स्कूल बंद हो गया। बचे हुए बच्चों को पढ़ाई जारी रखने के लिए दूसरे गांव जाने का कहा गया। नए स्कूल जाना उनके लिए मुश्किल काम था क्योंकि उन्हें पैदल ही बांदीपुर जंगल पार करना पड़ता था। इसलिए उस दूसरे गांव के कुछ बच्चों ने इन बच्चों की ग्रामीण लाइब्रेरी शुरू करने में मदद की, जो बाद में स्कूल में बदल गई। इसी तरीके को 7 दूसरी जगहों पर भी अपनाया गया। लाइब्रेरीज शुरू करने के लिए हर जगह उस दूसरे गांव के बच्चों को मदद के लिए बुलाया जाता था।

और इस तरह बच्चों ने अपने गांव चैगेलेट्‌टी को पढ़ाई के क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई। गांवों को इनके मंदिरों, नदियों और प्राचीन अवशेषों के लिए जाना जाता है। लेकिन बेंगलुरु से 25 किमी दूर चैगेलेट्‌टी, जिसका उच्चारण ‘चॉकलेटी’ भी किया जाता है, को अपनी लाइब्रेरी के लिए जाना जाता है। आपको सोच रहे होंगे कि इस लाइब्रेरी में ऐसा क्या खास है। इसका जवाब है कि इसे बच्चों ने शुरू किया और बच्चों द्वारा बच्चों के लिए ही चलाई जा रही है।

इसकी शुरुआत 14 अगस्त, 2010 को हुई, जब 10 से 12 साल के 6 बच्चों ने मिलकर एक छोटे से कमरे में लाइब्रेरी शुरू की। आज वे बड़े हो चुके हैं और डिग्री के लिए पढ़ रहे हैं या एमएनसी में काम कर रहे हैं। कार्तिक एन, मनासा वी, मेघना सीवी, शालिनी पीवी, दो बहनों वेदश्री सीके और वनीश्री सीके ने इस लाइब्रेरी की नींव रखी थी। अब बड़ी हो चुकी शालिनी कॉग्निजेंट में काम करती है। बाकी भी अभी अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं।

2006 में चाइल्ड राइट्स (बाल अधिकार) ट्रस्ट उनके स्कूल में बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने आया था। इन बच्चों और 24 अन्य बच्चों ने इस प्रोग्राम को गंभीरता से लिया और ‘चैगेलेट्‌टी चाइल्ड राइट्स क्लब’ बनाया। दिन बीतते गए और केवल 6 बच्चे बचे। बाकी 24 ने अलग-अलग कारणों से इसे छोड़ दिया। ये 6 घर-घर जाकर पल्स पोलियो, बाल विवाह आदि के बारे में जागरूकता फैलाते थे। गर्मी की छुटि्टयों में वे किताबें पढ़ने मारेनाहाली पंचायत लाइब्रेरी जाते थे, जो उनके गांव से 68 किमी दूर थी। उन दिनों इतनी यात्रा मुश्किल होती थी। वे मदद के लिए चाइल्ड राइट्स ट्रस्ट गए। वे इस शर्त पर तैयार हुए कि बच्चों को लाइब्रेरी चलाने की अनुमति दी जाए।

इस लाइब्रेरी में अगर किताब फट जाती है या उसे नुकसान पहुंचता है तो बच्चों को फाइन देने की जरूरत नहींं है, लेकिन उन्हें लाइब्रेरी का सदस्य बनाने के लिए एक नए व्यक्ति को लाना पड़ता है। नए पंजीकृत व्यक्ति को बैज के लिए 10 रुपए देने होते हैं और इसके बाद कोई चार्ज नहीं लिया जाता। हर महीने के पहले रविवार को वे उन किताबों पर चर्चा और विश्लेषण करते हैं, जो बच्चों ने पढ़ी हों। लाइब्रेरी के सदस्य पास के गांवों में जाते हैं और सरकारी स्कूल के बच्चों को किताबें देते हैं। अगली ट्रिप में इन्हें नई किताबों से बदल दिया जाता था।

आज इस लाइब्रेरी में 6,000 किताबें हैं और एक अनूठा कंसेप्ट है ‘GROW-BY रीडिंग’। ये ग्रीन, रेड, ऑरेंज, व्हाइट, ब्लू और येलो रंगों के कोड से बना नाम है। हर रंग व्यक्ति की पढ़ने में रुचि के आधार पर किताब का स्तर बताता है। जहां हरा रंग उन बच्चों के लिए है, जो तस्वीरें और चित्र पहचान सकते हैं, वहीं लाल, नारंगी और सफेद उन पाठकों को दर्शाता है जो कम तस्वीरों वाली किताबें पढ़ सकते हैं। और अाखिर में नीले और पीले रंग उपन्यास, साहित्य, नाटक, गद्य और किसी अवधारणा को विस्तार से समझाने वाली किताबों को दर्शाते हैं।

फंडा यह है कि कौन कहता है कि बच्चे कमाल नहीं कर सकते? उन्हें एक मौका तो दें, उनमें आपको चौंकाने की क्षमता है।

मैनेजमेंट फंडा**



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कौन कहता है बच्चे कमाल नहीं कर सकते? कौन कहता है बच्चे कमाल नहीं कर सकते? Reviewed by Dibyendu on 17:58 Rating: 5

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