आज निर्जल व्रत रखकर विष्णु पुराण का करें पाठ, सभी प्रकार के यज्ञ, व्रत एवं तपस्या करने का फल प्राप्त होने की है मान्यता
अधिक मास या फिर मल मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को कहा जाता है। इसे कमला या पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहते हैं। अधिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी 27 सितंबर को है। अधिकमास में पड़ने वाली एकादशी को कमला एकादशी, पद्मिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस एकादशी का बहुत महत्व होता है। एकादशी सुबह 6.02 बजे शुरू होगी और एकादशी 28 सितंबर को सुबह 7.50 बजे समाप्त होगी।
रात्रि में भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें, प्रति प्रहर विष्णु और शिवजी की पूजा करके भेंट प्रस्तुत करें
आचार्य इंद्रदास ने बताया कि सुबह स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु की विधि पूर्वक पूजा करें। निर्जल व्रत रखकर विष्णु पुराण का श्रवण अथवा पाठ करें। रात्रि में भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। रात में प्रति पहर विष्णु और शिवजी की पूजा करें। प्रत्येक प्रहर में भगवान को अलग-अलग भेंट प्रस्तुत करें जैसे प्रथम प्रहर में नारियल, दूसरे प्रहर में बेल, तीसरे प्रहर में सीताफल और चौथे प्रहर में नारंगी और सुपारी आदि।
द्वादशी के दिन सुबह भगवान की पूजा करें। फिर ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा सहित विदा करें। इसके पश्चात स्वयं भोजन करें। उन्होंने बताया कि ऐसा माना जाता है कि पद्मिनी एकादशी भगवान विष्णु जी को अति प्रिय है इसलिए इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला विष्णु लोक को जाता है और सभी प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपश्चर्या का फल प्राप्त कर लेता है।
सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई थी एकादशी के व्रत की कथा
त्रेता युग में एक पराक्रमी राजा कीतृवीर्य था। इस राजा की कई रानियां थी, लेकिन किसी भी रानी से राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। संतान प्राप्ति की कामना से तब राजा अपनी रानियों के साथ तपस्या करने चल पड़े। तपस्या करते हुए राजा की सिर्फ हड्डियां ही शेष रह गईं लेकिन उनकी तपस्या सफल न हो सकी। रानी ने तब देवी अनुसूइया से उपाय पूछा।
देवी ने उन्हें मल मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा। रानी ने तब अनुसूइया के बताए विधान के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। रानी ने भगवान से कहा कि मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिए। भगवान ने तब राजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो जो तीनों लोको में आदरणीय हो और आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो।
भगवान तथास्तु कह कर विदा हो गए। कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया। कालांतर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ, जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था। ऐसा कहते हैं कि सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एकादशी के व्रत की कथा सुनाकर इसके महात्म्य से अवगत करवाया था।
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