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सारी दुनिया का बोझ ये उठाते हैं, अब इन्हें खुद का परिवार पालने का संकट, खाने को लाले

(सुनील)ट्रेनों के पहिए थमे तकरीबन एक महीना हो गया। प्लेटफॉर्म सूने-सूने हैं। खुशी खुशी यात्रियों का बोझकर उठाकर अपना घर चलाने वाले दौड़ते भागते कुलियों पर भी लॉकडाउन की बड़ी मार पड़ी है। इनके सामने भी परिवार पालने का संकट खड़ा हो गया। जो पैसे जोड़े थे, उससे किसी तरह अब तक काम चला। लुधियाना रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले करीब 53 कुलियों के सामने खाने के लाले पड़ने की नौबत आ गई है। अफसोस है इनके लिए न तो रेलवे की तरफ से कोई इंतजाम किया गया और न ही शासन-प्रशासन या किसी सामाजिक संस्था की अब तक इन बेचारों पर नजर पड़ी है। इनमें से ज्यादातर फील्डगंज और मुंडियां की बादल कॉलोनी में रहते हैं।

20,000 के करीब कुली देश में

वैसे तो देश में 20 हजार के करीब कुली रेलवे और यात्रियों की सेवा में लगे हुए हैं। कमाई का कोई और जरिया न होने के कारण ये सभी इन दिनों ये बेसहारा हो गए हैं। रेलवे विभाग ने भी इन्हें इनकी हालत पर ही छोड़ दिया है। कुलियों का आरोप है कि कर्फ्यू के ऐसे हालात में भी रेलवे न तो उनकी सुध ले रहा और न ही उनकी पहले की ही मांगों पर ध्यान दिया जा रहा है। संकट की घड़ी में उन्हें रेल विभाग द्वारा दरकिनार कर दिया गया है। वहीं कुलियों के यूनियन ने भी रेलव अफसरों पर उनकी अनदेखी का आरोप लगाया है।

करियाना वाले भी नहीं दे रहे उधार

लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में करियाना वाले उधार में राशन दे देते थे। अब उन्होंने ने भी बंद कर दिया है। परिवार में छोटे-छोटे तीन बच्चे हैं। अब खाने-पीने की दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। फिलहाल लंगर बांटने वालों के सहारे ही एक समय की रोटी खा कर गुजारा कर रहे हैं।- बब्लू

डीआरएम से लेकर उच्च अधिकारियों तक की मांग

लॉकडाउन में कुलियों को उचित मुआवजा देने के लिए रेलवे के डीआरएम से लेकर रेलवे से उच्च अधिकारियों तक से मांग की गई है। सारे अफसरों ने यूनियन की मांग को नजरअंदाज किया है। जिससे कुली समुदाय में काफी गुस्सा भी है।- सरवन कुमार, जनरल सेक्रेटरी, ऑल इंडिया रेलवे लाल वर्दी यूनियन

न रुपए हैं और न खाने-पीने का सामान
कर्फ्यू के कुछ समय तक तो गुजारा होता रहा। अब खाने के लिए ना तो राशन है और ना ही कुछ खरीदने के लिए पैसे। लंगर बांटने वाले आते हैं, उनसे एक वक्त की रोटी लेकर गुजारा कर रहे हैं रेलवे प्रशासन हमारे बारे कुछ नहीं सोच रहा। - सुरिंद्र

कुली निराश, रेलवे कोई कदम नहीं उठा रहा
कुलियों की मांग को रेलवे ने अक्सर नजरअंदाज ही किया है। लॉकडाउन के दौरान भी रेलवे द्वारा ऐसा ही रवैया अपनाया जा रहा है, जिसको लेकर कुलियों में रोष है। अब कुली परिवार के पालन-पोषण को लेकर निराश हो चुके हैं। -कश्मीरी लाल, प्रधान, ऑल इंडिया रेलवे लाल वर्दी यूनियन

67 डिवीजन, 20 हजार कुलियों में महिलाएं भी
पूरे भारत में रेलवे की 67 डिवीजन है और 17 जोन हैं। इन सभी डिवीजन के मुख्य रेलवे स्टेशनों पर कुली तैनात रहते हैं। कुली यूनियन के सदस्यों के मुताबिक पूरे भारत में लगभग 20 हजार कुली हैं। इनमें महिलाएं भी शामिल हैं।



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They bear the burden of the whole world, now they have the trouble to raise their own family, bring food


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सारी दुनिया का बोझ ये उठाते हैं, अब इन्हें खुद का परिवार पालने का संकट, खाने को लाले सारी दुनिया का बोझ ये उठाते हैं, अब इन्हें खुद का परिवार पालने का संकट, खाने को लाले Reviewed by Dibyendu on 17:24 Rating: 5

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