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देश में मानसिक रोगों के मामले 20% बढ़े**

कोरोना के दौर में हम लेखन, चित्रकारी, नृत्य, गीत से अपने भीतर का कलाकार ला सकते हैं सामने

कोरोना वायरस ने दुनियाभर में डर और चिंता का माहौल बना दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी संकट की इस घड़ी में लोगों से अन्य सावधानियों के साथ अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने को कह रहा है। कोरोना वायरस डर, चिंता और अवसाद तक का कारण बन सकता है। विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि मरीज, क्वारेंटाइन में या आइसोलेशन में रह रहे व्यक्ति और यहां तक कि इलाज कर रहे व्यक्ति की मानसिक सेहत पर इससे असर पड़ सकता है। कोरोना का मानसिक रोगियों की संख्या पर असर दिखने भी लगा है। देश में मनोचिकित्सकों के सबसे बड़े एसोसिएशन इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी के सर्वे के मुताबिक कोरोना वायरस के आने के बाद देश में मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों की संख्या 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गई है। सर्वे बताता है कि मरीजों की यह संख्या एक हफ्ते के अंदर ही बढ़ी है और वैश्विक महामारी इसका एक कारण हो सकता है। लोगों में लॉकडाउन के चलते बिजनेस, नौकरी, कमाई, बचत और यहां तक कि मूलभूत संसाधन खोने तक डर भी इसका कारण माना जा रहा है। इसी साल जनवरी में इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने भी बताया था कि हर पांच में से एक भारतीय किसी न किसी मानसिक रोग का शिकार है। चिंता की बात यह है कि कोरोना के बाद अगर मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती है, तो इसके लिए देश को दुनिया में जागरूकता और सुविधाएं, दोनों की ही कमी है। दुनियाभर में सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में केवल 1 फीसदी हेल्थ वर्कर्स ही मेंटल हेल्थ के इलाज से जुड़े हुए हैं.

कोरोना वायरस के कारण कई लोग क्वारेंटाइन, आइसोलेशन में या फिर अकेले रहने को मजबूर हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना और भी जरूरी हो जाता है। जानिए देश मे मेंटल हेल्थ ही स्थिति, क्वारेंटाइन से मानसिक सेहत पर असर, और इससे बचाव के तरीकों के बारे में सबकुछ।

जन्म-जन्मांतर की प्रेम कथाओं पर आधारित फिल्में

28 मार्च को कारगिल में एक शिशु का जन्म हुआ। पति को कोरोना का इन्फेक्शन था, लेकिन प|ी वायरस से मुक्त थी। शिशु का परीक्षण किया गया। उसे कोरोना नहीं है। अत: हम मान लें कि जीन्स द्वारा बीमारी आगे नहीं बढ़ रही है। कुछ बीमारियां वंशानुगत होती हैं। कमाल अमरोही द्वारा निर्देशित फिल्म ‘महल’ में पुनर्जन्म का षड्यंत्र संपत्ति हड़पने के लिए रचा गया था। अत: अशोक कुमार द्वारा निर्मित इस फिल्म को पुनर्जन्म अवधारणा की फिल्म नहीं माना जा सकता। ज्ञातव्य है कि जयपुर में जन्मे खेमचंद प्रकाश ने फिल्म का संगीत रचा था। फिल्म का गीत ‘आएगा आने वाला..’ आज भी सुना जा रहा है।

अमेरिका में बनी फिल्म ‘रीइन्कारनेशन ऑफ पीटर प्राउड’ से प्रेरित सुभाष घई ने ऋषि कपूर, टीना मुनीम, सिम्मी ग्रेवाल प्राण और प्रेमनाथ अभिनीत ‘कर्ज’ बनाई। मूल फिल्म में प|ी दूसरी बार जन्म लिए पति की हत्या करते समय कहती है कि वह जितनी बार जन्म लेगा, उतनी बार वह उसकी हत्या करेगी। सुभाष घई ने अपनी फिल्म को सुखांत बनाया। चेतन आनंद ने राजकुमार, राजेश खन्ना विनोद खन्ना, हेमा मालिनी, प्रिया राजवंश अभिनीत ‘कुदरत’ बनाई। यह फिल्म भी पुनर्जन्म अवधारणा से प्रेरित थी।

पुनर्जन्म अवधारणा से प्रेरित दिलीप कुमार वैजयंती माला, जयंत, जॉनीवाकर और प्राण अभिनीत ‘मधुमति’ पुनर्जन्म अवधारणा की पहली फिल्म मानी जा सकती है। बिमल रॉय की कुछ फिल्मों ने यथेष्ठ कमाई नहीं की थी और वे बंगाल वापसी कर विचार कर रहे थे। उनकी दुविधा को समझकर तपन सिन्हा ने ‘मधुमति’ की पटकथा लिखी। सलिल चौधरी और शैलेंद्र ने लोकप्रिय माधुर्य रचा। इसके गीतों में विलक्षण विविधता है। कबीर की परंपरा का गीत मैं ‘नदिया फिर भी मैं प्यासी, भेद यह गहरा, बात जरा सी..’ सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ। कुछ वर्ष पहले ही फरहा खान निर्देशित शाहरुख और दीपिका अभिनीत फिल्म ‘ओम शांति ओम’ भी पुनर्जन्म अवधारणा प्रेरित है। इसे ‘मधुमति’ का अधपका चरबा माना जा सकता है।

पश्चिम में पुनर्जन्म अवधारणा पर बहुत शोध हुआ है। फिल्में भी बनी हैं। जर्मनी के डॉ. वीज ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया है। मनुष्य को हिप्नोटाइज करके उसे विगत जन्म की यादों के गलियारे में भेजा जाता है। इस प्रक्रिया का उपयोग चेतन आनंद की ‘कुदरत’ में किया गया है। पश्चिम की फिल्म ‘बीइंग बोर्न अगेन’ में प|ी की आयु तीस वर्ष है और उसका पति अपने पुनर्जन्म में सात वर्ष का है। परंतु इस जन्म में आयु के अंतर के कारण वे साथ नहीं रह सकते। कन्नड़ भाषा के भैरप्पा के उपन्यास ‘दायरे आस्थाओं के’ में पति की मृत्यु के समय प|ी गर्भवती थी। घटनाक्रम उस समय रोचक हो जाता है जब एक 18 वर्ष का युवक यह सिद्ध कर देता है कि वही उस विधवा का विगत जन्म का पति है। वह कस्बे के हर व्यक्ति को पहचानकर ऐसी बातें बताता है जो केवल उसी व्यक्ति को मालूम हैं। वह एकांत में प|ी के शरीर में कहां तिल है, यह सब भी बता देता है। पंचायत कहती है कि यह 18 वर्षीय युवा अपनी 36 वर्षीय प|ी के साथ दाम्पत्य जीवन प्ररंभ कर सकता है। घटनाक्रम तब अधिक रोचक हो जाता है, जब स्त्री का पति की मृत्यु के बाद जन्मा 18 वर्षीय पुत्र लौट आता है। वह महानगर में विज्ञान का छात्र है और पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं करता। उसे यह रिश्ता स्वीकार नहीं है। उस बस्ती में राधा-कृष्ण का एक पुराना मंदिर है, जिसमें मूर्तियों में हीरे जड़े हैं। कुछ पर्ष पहले चोर मूर्तियां लेकर भाग रहे थे और युवा उनसे मूर्तियां छीन लेता है। चोर उसका पीछा करते हैं। वह समझ लेता है कि चोरों का दल उसे पकड़ लेगा। अत: मूर्तियों को एक कुएं में फेंक देता है। चोर उसे पकड़कर मूर्तियों के बारे में पूछते हैं और उसके इनकार करने पर उसे मार देते हैं। यही युवा अपने नए जन्म में अपने से दोगुनी आयु की स्त्री के साथ दाम्पत्य जीवन जीता है। क्लाइमैक्स में पुनर्जन्म लिया युवा कुएं से मूर्तियां निकालता है। विज्ञान के छात्र को इस घटना से पुनर्जन्म में विश्वास हो जाता है। बहरहाल, यह बताया कठिन है कि कोरोना पीड़ित व्यक्ति की संतान को भी जन्म से यह रोग होगा या नहीं। जीन्स रहस्यमय होते हैं।

भौतिक रूप से दूर रहते हुए भी भावनात्मक तौर पर करीब रहें

कोविड-19 ने हमें कई नए शब्द दिए हैं। वे अपने साथ एक नई जीवनशैली अपनाने का भाव भी साथ लेकर आए हैं। लॉकडाउन। सेल्फ आइसोलेशन। क्वारंटीन। ठहर जाना। सोशल डिस्टेंसिंग। सावधान रहना। यात्रा पर रोक। वर्क फ्रॉम होम। स्कूल ऐट होम। यह सब कुछ ही हफ्तों में हो गया। हम सब एक ही नाव में हैं और खुद को और अपने परिवारों को इस परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार कर रहे हैं। हम बाहरी दुनिया से अपने संपर्क को कम से कम करते जा रहे हैं। हमारा भौतिक संपर्क जीवित रहने के लिए बेहद ज़रूरी जरूरतों तक ही सीमित है। महत्वपूर्ण यह है कि यह सब हम कैसे करते हैं। दैनिक जीवनचर्या में हमारा संतुलित और दूसरों की फिक्र से भरा मनोभाव दूसरों तक पहुंचता है। कोविड-19 जाति, लिंग, संस्कृति या राष्ट्रीयता में भेदभाव नहीं करता। इसलिए हमें सबके प्रति उदार और करुणावान बने रहना चाहिए। सामाजिक दूरी को समझने के लिए आइए इन दो शब्दों, ‘सामाजिक’ और ‘दूरी’ को समझें। सामाजिक का अर्थ है सहचर्य और मित्रता। दूरी का अर्थ है अलग रहना। सरल शब्दों में सामाजिक दूरी स्वयं और दूसरों के बीच एक फासला बनाए रखना है, चाहे वे बीमारी से प्रभावित हों या नहीं। लेकिन क्या हमें वास्तव में सामाजिक रूप से दूरी रखने को कहा जा रहा है? बिलकुल नहीं। भौतिक रूप से दूर रहते हुए हमें स्वयं से पूछना है कि कहीं हम खुद को भावनात्मक रूप से भी तो दूर नहीं कर रहे हैं? हमें किसी भी तरह इन दोनों बातों को आपस में गड्ड-मड्ड होने से बचाना है। हम हमेशा भौतिक दूरियों के साथ रहते आए हैं। पति-प|ी अलग-अलग महाद्वीपों में कार्य करते हैं और परिवार पूरे संसार में फैले हुए हैं। आज हम तकनीक से सामाजिक और भावनात्मक संपर्क रखते हैं और हमारी जीवनशैली लंबे समय से ऐसी ही है। क्या यह विपदा हमें जगाने के लिए है कि हम और अधिक काम करें और अधिक सचेत रहें या यह केवल एक चेतावनी है?

छोटी-छोटी बातों से बचना, जैसे अपने प्रियजनों को गले नहीं लगाना, हाथ नहीं मिलाना या अपने चेहरे को नहीं छूना, हमारी कुदरती सहज प्रवृत्तियों के खिलाफ है। और ऐसे परिवारों के लिए जो समुंदर पार की दूरी महसूस करते हैं, भयभीत और चिंतित होना स्वाभाविक है। लेकिन, हमें एक और अधिक शक्तिशाली संपर्क के माध्यम को भी याद रखना चाहिए जो हमें मिला हुआ है। वह है हृदय से हृदय के संपर्क में बने रहना। प्रेम प्रेषित करना। मैं एक छोटा सा अभ्यास बता रहा हूं जो हम अपने प्रियजनों के साथ रोज कर सकते हैं-

आराम से बैठकर अपनी आंखें कोमलता से बंद कर लें। जिस व्यक्ति को आप प्रेम भेजना चाहते हैं उन्हें अपने सामने बैठा हुआ महसूस करें। अपने हृदय को उनके हृदय से जुड़ता हुआ महसूस करें। इस जुड़ाव को महसूस करते हुए अपने हृदय से उनके हृदय तक प्रेम और परवाह को बड़ी कोमलता के साथ प्रेषित करें। कुछ मिनट बाद आपको और जिसे आप प्रेम भेज रहे हैं उस व्यक्ति को शांति का अनुभव होगा। कछुए भी अपने परिवारजनों के साथ मानसिक संपर्क बनाए रखना अच्छी तरह जानते हैं। जब मादा कछुए के अंडे देने का समय आता है तो वह समुद्र में अपने स्थान से तैरकर रेतीले तट पर पहुंचती है, गड्ढे खोदती है और रेत में अंडे देकर उन्हें सुरक्षित रखने के लिए ढंक देती है। फिर वह तैरकर समुद्र में वापस चली जाती है। जब दो महीने बाद कछुए के बच्चे पैदा होते हैं तो वे तेजी से लहरों की ओर चल पड़ते हैं और आश्चर्यजनक रूप से अपनी मां तक तैरकर पहुंच जाते हैं। अगर कछुए इस तरह का संपर्क रख सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हर परिस्थिति में अवसर छिपे हुए होते हैं। कोविड-19 मानवता के लिए एक अवसर है कि हम अपने आंतरिक तल की गहराइयों से एक-दूसरे के संपर्क में रहें और इसे समझें। अगर हम बाहर नहीं जा सकते तो भीतर चलें। ।

सरल तरीकों से एक-दूसरे तक पहुंचने की संभावनाएं खोजें। यह साथ में गीत गाने, ध्यान करने, फिल्म देखने, साथ बैठकर भोजन करने या चुटकुले सुनाने के द्वारा हो सकता है, क्योंकि यह सबको पता है कि जीवंतता, खुशी और हास्य से पीड़ा कम होती है। सरल आदतें, जैसे भोजन सामग्री को बचाकर रखना हमें लंबे समय तक बचा सकेगा। हम उपवास को भी आजमा सकते हैं। बुद्धिमानी इसी में है कि वित्तीय साधनों का भी ध्यान रखें और घबराहट में अधिक सामान खरीदने की कोशिश न करें। हम अपने वृद्धजनों एवं उनकी, जो कम भाग्यशाली हैं उनकी सहायता कर सकते हैं। कितने ही छोटे-छोटे कार्य हैं जिनके लिए हमें समय नहीं मिलता, जिन्हें हम अभी कर सकते हैं। हम लिखने, चित्र बनाने, नृत्य करने, गीत गाने, नए व्यंजन बनाने, प्रियजनों के लिए कपड़े सिलने जैसे कार्यों से अपने भीतर के कलाकार को सामने ला सकते हैं। घर में रहते हुए आलस्य करके समय बर्बाद करना आसान है पर क्यों न इस अवसर का स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, पांच मिनट श्वास आधारित व्यायाम, ध्यान और योगासन करने जैसे उपायों से लाभ उठाया जाए? स्वयं के लिए अभ्यास करें। अपने प्रियजनों के लिए अभ्यास करें।(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

भले लॉकडाउन रहे लेकिन किसानों के रास्ते खुले रहें

काेरोना के संकट के बीच हाउसिंग सोसायटी में रहने वाले लोग प्रवासी श्रमिकों, घरों में काम करने वाली महिलाओं, झुग्गियों में रहने वालों और बाकी गरीबों को ऐसे दिखा रहे हैं कि जैसे समस्या वे ही हों। जबकि सत्य यह है कि कोविड-19 व इससे पहले सार्स को देश में लाने वाले विमानों में सफर करने वाले लोग थे। इस बात को पहचानने की बजाय ऐसा लग रहा है कि हम लोग इन अवांछित लोगों के शुद्धिकरण से अपने शहरों को ही सैनिटाइज करने की कोशिश कर रहे हैं। जरा सोचें कि अगर हम उड़ने वाले लोगों ने ही सड़कों पर जा रहे प्रवासी श्रमिकों मेें से किसी को संक्रमित किया हो और जब वे अपने गांव पहुंचेंगे तो क्या होगा? कुछ हद तक मध्यम वर्ग इस बात से आश्वस्त दिखता है कि अगर वे घर पर रहेंगे और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करेंगे तो सब ठीक होगा। कम से कम हम वायरस से बचे रहेंगे। इस बात का कोई अनुमान नहीं है कि आर्थिक संकट हम पर कैसे असर करेगा। कई लोगांे के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब कुछ और है। सैकड़ों साल पहले हमने इसका बहुत ही ताकतवर जरिया खोजा था- जाति। इस लॉकडाउन में भी वर्ग और जाति के फैक्टर समाहित हैं।

हमारे लिए यह बात मायने नहीं रखती कि हर साल करीब ढाई लाख लोग टीबी से मर जाते हैं। या फिर डायरिया हर साल एक लाख बच्चांे की जान ले लेता है। वे हमारे नहीं हैं। घबराहट तब होती है, जब सुंदर लोगों को लगता कि उनके पास किसी बीमारी के प्रति प्रतिरोधकता नहीं है। सार्स और 1994 के प्लेग के समय ऐसा ही हुआ। ये दोनों ही खतरनाक बीमारियां थीं, लेकिन इनसे भारत में उतने लोगों की मौत नहीं हुई, जितनी हो सकती थी। लेकिन, इन पर बहुत ध्यान दिया गया। यह सोचना खतरनाक है कि हम सिर्फ एक वायरस से लड़ रहे हैं और एक बार इससे जीत जाएं तो सब ठीक हो जाएगा। निश्चित ही हमें कोविड-19 से पूरी ताकत से लड़ने की जरूरत है, क्योंकि यह 1918 के स्पेनिश फ्लू से भी खतरनाक हो सकता है। उस समय तीन सालों में भारत मेें इससे 1.6 से 2.1 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। लेकिन, कोविड-19 पर जिस तरह से बड़े वर्ग को बाहर करके फोकस किया जा रहा है, वह वैसा ही है जैसे कि सभी टांेटियों को खुला छोड़कर फर्श को पोंछे से सुखाने की कोशिश हो रही हो। हमें ऐसे कदम की जरूरत है, जिससे जनस्वास्थ्य तंत्र मजबूत हो।

1978 में अल्माअता घोषणा-पत्र में 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य का नारा दिया गया था। लेकिन, 1980 से स्वास्थ्य में सामाजिक और आर्थिक बातों को महत्व देने का सिलसिला शुरू हो गया। 1990 आते-आते दुनियाभर से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के विचार को कचरा कर दिया गया। 1990 में वैश्वीकरण की संक्रामक बीमारी आई। लेकिन, स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक वैश्विक हेल्थ तंत्र बनाने की बजाय अनेक देशों ने अपने स्वास्थ्य तंत्र का और भी निजीकरण कर दिया। भारत में तो निजी क्षेत्र हमेशा ही हावी रहा। हम दुनिया में स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का सबसे कम हिस्सा (केवल 1.2 फीसदी) खर्च करने वालों में हैं। हमारा स्वास्थ्य तंत्र 1990 से सरकारी नीतियों के चलते और भी कमजोर हो गया। मौजूदा सरकार तो निजी प्रबंधन को जिलास्तरीय अस्पतालों के अधिग्रहण के लिए आमंत्रित कर रही है। ग्रामीण भारत में लोगों के कर्ज में डूबने की एक बड़ी वजह इलाज पर होने वाला खर्च है। हजारों किसानों की आत्महत्या की एक बड़ी वजह भी स्वास्थ्य के लिए लिया जाने वाला कर्ज है। हमारे पास सबसे बड़ी आबादी है, जिसके पास कोविड-19 से मुकाबले के न्यूनतम साधन हैं। दुखद यह है कि आने वाले सालों में किसी और नाम से नई आपदाएं भी आना तय है।

ग्लोबल वायरोम प्रोजेक्ट के प्रो. डेनिस कैरोल ने हाल ही में ध्यान दिलाया है कि तेल व खनिजों की तलाश मंे हमने उन जगहों को खोद दिया है, जहां पर शायद ही कोई रहता हो। इससे हमारे इकोसिस्टम में तो घुसपैठ हुई ही है, लेकिन इसने वन्यजीवन व मनुष्य के संपर्क को भी बढ़ाया है, जिससे हम ऐसी बीमारियों और वायरस के संक्रमण के शिकार हो रहे हैं, जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। अब हम क्या कर सकते हैं? पहली चीज, हमें अपने 6 करोड़ टन के सरप्लस अनाज के भंडार का आपात वितरण करना चाहिए और इस संकट में उजड़ गए प्रवासी मजदूरों व गरीबों तक इसे पहुंचाना चाहिए। बेघरों व रास्तों में फंसे लोगों के लिए बंद स्कूलों में रहने की व्यवस्था करनी चाहिए। दूसरा, ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि किसान न केवल अपनी मौजूदा फसल को बेच सकें, बल्कि खरीफ की फसल भी उगा सकें। सरकार को पूरे देश में निजी अस्पतालों में एक कोरोना कॉर्नर बनाना चाहिए। संकट जारी रहने तक मनरेगा का वेतन रोज बांटा जाना चाहिए। इस अवधि में शहरी मजदूर को कम से कम छह हजार रुपए प्रतिमाह दिए जाएं। क्या हम कोविड-19 संकट को असमानता और न्यायपूर्ण स्वास्थ्य पर एक बहस के मौके के रूप में देख सकते हैं।

(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

हर धर्म के महान लोगों का समावेश है राम में

राम ने जितना अपने सार्वजनिक जीवन को साधा, उतना ही एकांत को भी सहेजा था। शायद ही कोई अवतार हो, जिसने चौदह साल का वनवास स्वीकार किया। वनवास का अर्थ ही है भीड़, शोर, आपाधापी से दूर एकांत में तपस्वी जीवन जीना। रावण जैसे राक्षस से लड़ने के लिए वनवास आवश्यक था। लड़ाई बहुत बड़ी सेना या बहुत सारे लोगों के साथ नहीं हो सकती थी, यह बात राम, प|ी सीता को समझा चुके थे। इस समय हमें भी कोरोना रूपी रावण से ऐसे ही लड़ना है। हमारा घर में रहना वनवास का एक ऐसा रूप है, जिसमें हम अपने आपको राम की तरह तैयार कर सकते हैं एक बड़े अभियान के लिए। इस त्रासदी से निपटना है, कोरोना रूपी राक्षस को समाप्त करना है तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर का राम जगाना होगा। राम केवल हिंदू धर्म के देवता हों, ऐसा नहीं है। उनकी जीवनशैली में हर धर्म के महान लोगों का समावेश है। पहाड़ पर चढ़ने का एक कायदा है कि शरीर को झुकाना पड़ता है। इस त्रासदी की इतनी बड़ी पहाड़ी चढ़ना है तो थोड़ा झुक जाइए। यहां झुक जाने का मतलब है विनम्र हो जाएं। समझ से काम लें, दूसरों के लिए जीना हो तो खुद भी कुछ समझौते कर लें। आज राम जन्मोत्सव पर बड़ी साधना यही होगी कि अपने घरों में रुके रहें, परिवार के बीच आनंदित जीवन जीएं। अपने भीतर ऐसा उत्साह भर लें कि यदि राम ईश्वर होकर मनुष्य बन सकते हैं, हमें समझाने के लिए लीला कर सकते हैं तो हम मनुष्य क्यों न कुछ ऊपर उठें।

बहुत महंगी पड़ सकती है सरकार की हिमालयी चूक

कोरोना संकट विदेशों से आ रहा है, इस बात की जानकारी सड़क पर चल रहे हर दूसरे व्यक्ति को होली के दो सप्ताह पहले से थी। लिहाजा 10 मार्च को होली पर लोगों ने खुद ही एक जगह जमा होने से परहेज किया। ब्यूरो ऑफ इमीग्रेशन (बीओआई) से गृह मंत्रालय को मिल रही जानकारी के अनुसार, विगत 1 जनवरी से तबलीगी जमात के 2100 विदेशी मौलाना भारत आए और इनमें से 1000 ठहर गए। अधिकांश लोग दिल्ली के निजामुद्दीन स्थिति मरकज के परिसर में रहे या देश के 19 राज्यों की बड़ी मस्जिदों में पहुंचे। ऐसे में कम से कम जब संकट के बादल साफ दिखने लगे तो इन लोगों पर नज़र रखनी चाहिए थी। अगर आम जनता होली जैसा त्योहार मनाने से संकोच करने लगी थी तो क्या इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) को सरकार को सतर्क नहीं करना चाहिए था? निजामुद्दीन स्थित ऐसे कई संगठनों की गतिविधियों की जानकारी के लिए आईबी के एक डीसीआईओ (डिप्टी एसपी) रैंक के ऑफिसर की निगरानी में दो सहायक इंटेलिजेंस ऑफिसर की ड्यूटी रहती है। क्या उन्होंने यह नहीं बताया कि 13 मार्च से अगले तीन दिन तक देशभर के डेढ़ दर्जन राज्यों के सैकड़ों मौलाना इस जलसे में पहुंचे हैं, जबकि उस दिन 200 से ज्यादा लोगों के एकत्र होने पर सरकारी पाबंदी थी? दिल्ली सरकार व केंद्र दोनों ने ही इस पर ध्यान नहीं दिया। वह तो तेलंगाना सरकार ने इस मरकज से मीटिंग के बाद अपने यहां आए तबलीगी जमात के एक इंडोनेशियाई मौलाना को 17 मार्च को पॉजिटिव पाया और तुरंत केंद्रीय गृहमंत्रालय को सूचना दी। लेकिन, यहां के अधिकारियों को चार दिन लग गए यह पता करने में कि कितने विदेशी मौलाना इस समय भारत के किन-किन हिस्सों में गए हैं और मीटिंग में कितने भारतीय लोगों ने शिरकत की थी। तबलीगी जमात के मरकज पर छापा मारने में ही एक सप्ताह लग गया। सरकार को यह भी मालूम है कि तबलीगी जमात के ये मौलाना टूरिस्ट वीसा पर आते हैं न कि मिशनरी वीसा पर जबकि काम ये धर्म के प्रसार का करते हैं। दरअसल मिशनरी वीसा समयबद्ध और कम समय का होता है और सरकारें उनकी व्यापक जांच करती हैं। लिहाजा, लगभग दो दशकों से ये लोग छह माह का टूरिस्ट वीजा लेकर आराम से देशभर में घूमते रहते हैं। सरकार की यह हिमालयी चूक महंगी पड़ने जा रही है।

जीने की राह कॉलम पं. विजयशंकर मेहता जी की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए 9190000072 पर मिस्ड कॉल करें

0.3 मनोचिकित्सक हैं देश में प्रति एक लाख लोगों पर**

1.4 बेड हैं देश में प्रति एक लाख लोगों पर मेंटल हॉस्पिटल्स में**

4.66%

बीमारियां मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हैं, कुल बीमारियों में

14.53%

लोग देश में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्या से ग्रसित हैं

देश में मानसिक रोगियों और इलाज की सुविधाओं की स्थिति
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क्वारेंटाइन के दौरान कैसा महसूस कर सकते हैं आप
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डब्ल्यूएचओ ने दिए मेंटल हेल्थ अच्छी बनाए रखने के लिए टिप्स

{इस दौरान दु:ख, तनाव, भ्रम, डर और गुस्सा महसूस करना सामान्य है। अपने दोस्तों और परिवार के संपर्क में रहें।

{घर में रहते हुए हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं। अच्छी डायट, पर्याप्त नींद और रोजाना एक्सरसाइज बहुत जरूरी है।

{भावनाओं से लड़ने में स्मोकिंग या शराब का सहारा न लें।

{अगर आप बहुत भावनात्मक उथलपुथल से जूझ रहे हैं तो किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता या काउंसलर से संपर्क करें।

{ऐसी खबरों या मीडिया कवरेज को सुनना और देखना कम करें, जो आपको और आपके परिवार को चिंतित करते हों।

{उन कौशलों को इस्तेमाल करें जिन्होंने आपको जीवन में पहले भी बुरी स्थिति का सामना करने में मदद की है। इन कौशलों से आप महामारी वाली अभी की स्थिति में अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

{कैसे पहचानें कि कोरोना की वजह से एंग्जायटी या पैनिक है

कोरोना वायरस के कारण आपको एंग्जायटी डिसऑर्डर और पैनिक अटैक तो नहीं हो रहे, इसकी जांच आप इन लक्षणों को देखकर कर सकते हैं:

{बार-बार तथ्य और आंकड़े जांचते रहते हैं

{नींद नहीं आती, सोचते रहते हैं कि कुछ बुरा हो सकता है

{बार-बार बीते दिनों को याद करते हैं

{लगभग हर चीज को लेकर ग्लानि होती है

{भूख सताती रहती है और एक साथ बहुत सारा खाना खाते हैं

{कंपकपी होती है और किसी चीज में ध्यान नहीं लगता है

{क्या क्वारेंटाइन के बाद भी बना रहेगा दिमाग पर असर?

क्वारेंटाइन की वजह से आए मनोवैज्ञानिक बदलावों का असर कुछ समय से लेकर लंबे समय तक रह सकता है। लैंसेट के मुताबिक सार्स बीमारी के फैलने के दौरान क्वारेंटाइन में गए लोग कुछ हफ्ते बाद तक भी क्वारेंटाइन वाली मनोस्थिति से नहीं निकल पाए। जैसे 26% लोग भीड़ वाली बंद जगहों में नहीं गए और 21% किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं गए। चीन में हुए एक अध्ययन ने भी बताया कि अस्पताल कर्मचारियों पर क्वारेंटाइन की वजह से हुए तनाव का असर तीन साल बाद तक भी देखा गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक लोगों से आजादी छिनने का असर दिमाग पर लंबे समय तक रह सकता है।

तस्वीर चीन के शहर नानजिंग की है। यहां कोरोना वायरस के मामले नियंत्रण में आने के बाद भी लोग पूरे एहतियात बरत रहे हैं। तस्वीर में एक परिवार इस तरह सुरक्षा के बीच लंच कर रहा है। एक्सपर्ट मानते हैं कि परिवार के साथ बिताया गया अच्छा समय डर और चिंता जैसी भावनाओं को कम करने में मदद कर सकता है।

परिवार का साथ अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी**

{क्वारेंटाइन का दिमागी सेहत पर क्या असर होता है?

किंग्स कॉलेज लंदन ने हाल ही क्वारेंटाइन के असर से जुड़े 24 पेपर्स का रिव्यू किया है। मेडीकल जर्नल लैंसेट में प्रकाशित इस रिव्यू के मुताबिक विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि क्वारेंटाइन में रहने वाले लोगों में संक्रमण का डर, चिढ़चिढ़ापन, बोरियत, जानकारी की कमी या सामान की कमी की चिंता, वित्तीय नुकसान और बीमारी से जुड़े लांछन का डर जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं देखी जा सकती हैं। अध्ययनों के मुताबिक अन्य मनोवैज्ञानिक लक्षणों में भावनात्मक अस्थिरता, अवसाद, तनाव, उदासी, एंक्जायटी (चिंता), पैनिक (घबराहट), नींद न आना, गुस्सा भी शामिल है। अध्ययन यह भी बताते हैं कि माता-पिता की तुलना में बच्चों में क्वारेंटाइन की वजह से 4 गुना ज्यादा तनाव होता है।

कोरोना वायरस का डर और चिंता मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है
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कोरोना वायरस के बाद एक हफ्ते में मेंटल हेल्थ से जुड़े मरीजों की संख्या बढ़ी है

4%**

5%**

18%**

18%**

18%**

20%**

राहत

खुशी

ग्लानि

उदासी

घबराहट


डर

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जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

 



कमलेश पटेल

आध्यात्मिक गुरु व लेखक

इस घड़ी में मजदूरों व गरीबों के लिए सरप्लस अनाज के भंडार खोले सरकार, बेघरों के रहने की हो व्यवस्था



पी. साईनाथ

वरिष्ठ पत्रकार

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पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com



04

, अमृतसर, वीरवार, 2 अप्रैल 2020



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Amritsar News - cases of mental illness in the country increased by 20
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देश में मानसिक रोगों के मामले 20% बढ़े** देश में मानसिक रोगों के मामले 20% बढ़े** Reviewed by Dibyendu on 18:55 Rating: 5

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