1956 के मेलबर्न ओलंपिक में बलबीर सिंह सीनियर ने कप्तानी की और आजाद भारत को तीसरा ओलंपिक गोल्ड मेडल दिलाया। विजेता टीम में उनके साथ रहे पूर्व कप्तान गुरदेव सिंह खुल्लर आज तक अपने सीनियर से जुड़ी बातों को भूल नहीं सके हैं। बलबीर सीनियर और गुरदेव सिंह दोनों का ही 1956 ओलंपिक गोल्ड मेडल में अहम योगदान रहा था। दोनों की गेम को खूब सराहा गया और उनके सम्मान में डोमिनिकन रिपब्लिक ने 1958 में स्टांप रिलीज की थी। इसे मेलबर्न ओलंपिक की सफलता के कारण रिलीज किया गया था।
गुरदेव सिंह खुल्लर अब इंग्लैंड में अपनी फैमिली के साथ रहते हैं लेकिन सीनियर के साथ बिताया टाइम उन्हें अभी भी अच्छे से याद है। गुरदेव सिंह ने कहा कि बलबीर सीनियर बेहद तेज प्लेयर थे, उन्हें कोई भी रोक नहीं पाता था। खासकर तब जब वे डी में पहुंच जाते थे, न तो डिफेंडर उनकी हिट की हुई बॉल को रोक पाते थे और न ही गोलकीपर। उनके जैसी गोल करने की स्किल्स किसी के पास नहीं थी। वो मुझे मैच से पहले कहते थे, सिर्फ बॉल को डी में पहुंचाना, बाकी मैं खुद देख लूंगा।
कुछ खाया तक नहीं
गुरदेव सिंह और बलबीर सीनियर की अंतिम बार मुलाकात लंदन में हुई थी, सीनियर 2011 में वहां गए थे और तब दोनों दोस्त एक दूसरे के गले लगे थे। गुरदेव सिंह की फैमिली मेंबर ने कहा कि 87 वर्षीय हॉकी स्टार ने जब से बलबीर सीनियर के जाने की खबर सुनी है तब से उन्होंने कुछ नहीं खाया है। उनके फैमिली मेंबर ने कहा कि हमने उन्हें कई बार खाने के लिए कहा है लेकिन वे नहीं खा रहे। उनका कहना है कि मैं अपने दोस्त के लिए व्रत रख रहा हूं और हम उन्हें फोर्स नहीं करना चाहते।
बॉल को तोड़ देते थे
सीनियर के बारे में बात को याद करते हुए गुरदेव सिंह ने कहा कि वो ट्रेनिंग पूरे जोश के साथ करते थे और बॉल को अपने साथ घर ले जाते थे। घर पर उन्होंने गोलपोस्ट बनाया था और वे लगातार उस पर अटैक करने का प्रयास करते। सुबह जब वो आते तो बॉल टूट चुकी होती थी। रात को भी वे अपनी प्रैक्टिस को बंद नहीं करते थे, इसीलिए वे महान खिलाड़ियों में शामिल हैं। हम कैंप के दौरान उनसे रिक्वेस्ट किया करते थे कि वे सो जाएं और सेट कर दें। लेकिन वे किसी की नहीं सुनते और अपनी प्रैक्टिस करते रहते।
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