1975 में मैं पीयू में वापस लौटने की कोशिश में था और जीएनडीयू से स्टडी लीव लेकर आया हुआ था। प्रो आरसी पॉल वीसी थे। उसी समय यहां पर इंडियन हॉकी टीम का कैंप लगा, जिसमें बिना किसी लिखित आदेश के स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट की जिम्मेदारी दी गई। 21 खिलाड़ी थे उस कैंप में। सबके टेस्ट लिए और आज भी उनके रिकाॅर्ड मेरे पास है लेकिन मैंने उनको कभी पब्लिश नहीं किया क्योंकि पता लगा कि विरोधी टीमें इसका उपयोग करते हैं। इसमें बलबीर सिंह एक ऐसे इंसान थे जिनके दिमाग में एक ही बात थी कि वर्ल्ड कप हमारा है और ये हमसे छीना गया है। वह इसे वापस पाना चाहते थे और पूरी टीम में इस बात के लिए डेडिकेशन पैदा की।
इसके अलावा माेस्ट बैलेंस्ड और विदाउट फस्सी व्यक्ति था असलम शेर खान। हालांकि, उसमें बहुत ज्यादा टेंशन थी क्योंकि टीम के लिए चुने गए बाकी खिलाड़ी ज्यादातर सरदार थे। लेकिन उनका न सिर्फ चयन हुआ बल्कि मुस्लिम देश मलेशिया के खिलाफ खेलते समय उनको पेनल्टी कॉर्नर का मौका भी बलबीर सिंह ने दिया। हालांकि, इस मैच का विनिंग गोल लगाया अशोक कुमार ने। आरएस बाेद्धी उनके फिजिकल ट्रेनर जो सबको मोटिवेट करते। अशोक कुमार गाना बहुत अच्छा गाते थे। उस समय गर्ल्स हॉस्टल नंबर चार बन रहा था और उसके कुछ तैयार कमरों में ही टीम और अधिकारी रहते थे।
उस समय तक दीवारें नहीं होती थीं और आना-जाना आसान था। बलबीर सीनियर ने सब में जोश भर दिया था कि ये कप हमारा है। ये दो साल से हमसे कैसे ले लिया। उन दिनों उनके पिता भी बीमार थे लेकिन उन्होंने इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने दिया। टीम चुनी गई और आए तत्कालीन सीएम ज्ञानी जैल सिंह। उनके शब्द थे “ मुंडेयो एक वार कप ले आओ तो फिर देखो कि मैं की करदा हां। टीम जीती और उन्होंने अपने सभी वादे पूरे किए। पीयू के ही स्विमिंग पूल पर फट्टे डाल कर सेलिब्रेशन हुआ। यहीं पर मुझे भी सम्मानित किया गया और मेरी जीवन की राह भी बदल गई। 1985 में मैं स्पोर्ट्स साइकोलॉजी एसोसिएशन का प्रेसिडेंट बना। सिंह की सबसे अच्छी बात थी कि नॉन एरोगेंट थे। उनको भारत रत्न सम्मान मिलना चाहिए। जैसा कि प्रो. जितेंद्र मोहन ने ननु जोगिंदर सिंह को बताया।
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